एक हिस्सा धूप

एक हिस्सा धूप , ऊर्जा के स्रोत का है।

एक हिस्सा धूप , संघर्ष का है।

एक हिस्सा धूप , नवांकुर का है।

अनगिनत रश्मियों से परिपूर्ण ये एक हिस्सा धूप , सृजन का है।

एक हिस्सा धूप , पतझड़ का भी है।

तो ये एक हिस्सा धूप, गलन को पिघला देने का भी है।

एक हिस्सा धूप, कालचक्र का भी है।

रश्मिरथी पे सवार ये एक हिस्सा धूप, कार्यों के निर्वाहन का भी है।

एक हिस्सा धूप, तमस के अंत का है।

एक हिस्सा धूप, अंतःकरण में विलीन होने का है।

एक हिस्सा धूप, तुम्हारा भी है।

ये एक हिस्सा धूप, मेरा भी है।

मसला

मसला टूटी सड़कों का है , गड्ढों में भरे बारिश के पानी का है।

मसला इस मूसलाधार बारिश में मिटटी के घरों के ढह जाने का है।

मसला ……… खुले मैनहोल और आय -दिन उसमे गिर के अपनी जान गवाने वालों का है।

अमीरों को अपने देश से बाहर भागने का मसला है !

तो बच्चों को किताबों के बोझ का मसला है,

और फिर टीचरों को TET एग्जाम पास करने का मसला भी है … !

इधर नौकरीपेशा को बढ़ते खर्चों का मसला है तो ,

उधर गरीब को डायन महंगाई का मसला है ।

और सरकारों को ….. अपनी कुर्सी बचाने का मसला है।

मसला ये भी है की वो क्या चाहते हैं ,

मसला ये भी है की हम क्या चाहते हैं ?

तो किसी के मर्म को समझना भी एक मसला है।

सरकारें आईं और गईं पर मसला वहीँ का वहीँ ,

किसी का कुछ मसला , तो किसी का कुछ ,

पर इन् मसलों को हल करना भी एक मसला है।

मुददतों बाद।

मुददतों बाद, आवाज़ सुनी उसकी।

मुददतों बाद, ठहर गया लम्हा वहीं ।

मुददतों बाद, फिर एक लम्बी ख़ामोशी थी , हम- दोनों के दरमियाँ।

मुददतों बाद!

मुददतों बाद, इन् खामोशियों में अपना नाम सुना मैंने ,

मुददतों बाद, लगा की ज़ोर से पुकारूँ उसका नाम, और इन् बादलों को चीरती मेरी आवाज़ मीलों दूर……… उस तक पहुँच जाये।

मुददतों बाद, लगा की फिर गले लगा लूँ उसे , की पता नहीं फिर मुलाकात हो न हो !

मुददतों बाद!

मुददतों बाद, फिर पता चला की कोरा सपना ही था ये।

मुददतों बाद, फिर से सिर्फ़ सपना ही था ये!!

मजदूर !

मजदूर हूँ मैं , और क्या पहचान है मेरी तुम्हारे लिए ?

तुम्हारे हाथ की कठपुतली हूँ मैं।

 

लोकतंत्र के तिलकधारियों ,

तुम्हारे वोट बैंक को हमने भरा 

और जब हमारी मदद करने की बारी आई तो ,

तुमने हमें सड़कों पर , रेलगाड़ियों के निचे और हमारे अजन्मे बच्चे को नालियों में मरने के लिए छोड़ दिया ??

इससे ज़्यादा ध्यान तो हम हमारे भेड़ -बकरियों का रखते हैं। 

 

अब् तुम्हारे इन् रहत पैकेजों का क्या करें हम जब हमारे अपने ही हमारे बीच  नहीं रहे। ..!

जो निकले थे अपने घरों की तलाश में , उन्हें क्या पता था 

की दिनों तक भूखे -प्यासे चिलचिलाती धुप में चलते रहने के बाद ,

एक दिन इन्हीं राहों में, पैरों में छाले और आँखों में घर तक जाने की इच्छा लिए वो आखरी साँस लेंगे। ..

 

क्या तुम्हारे टीवी पर किये खोखले भाषण और झूठे वादे , ज़िंदा कर पाएंगे उन्हें ?

क्या भेज पाएंगे उन्हें घर जहा अब भी कोई भीगी आँखों से उनका इंतज़ार कर रहा है। ..

जहाँ अब तक चूल्हा नहीं जला क्यूंकि , जो निकले थे घर से की घर का चूल्हा जलता रहे , अब् कभी घर वापस नहीं जा सकेंगे। .

 

क्या ये लोकतंत्र के तानाशाह वापस ला पाएंगे ?

उस अजन्मे बच्चे को जो इस दुनिया में आने से पहले ही आप की तानाशाही की भेट चढ़ गया?

क्या कम कर सकेंगे उस माँ का दुःख जिसकी  गोद भरते ही सुनी हो गई??

विदेशों में विमान भेजने की सुविधा देने वाले , अपने ही देश में बसें भी नहीं चला सकते थे ??

विदेशियों से ज़्यादा खतरा तो हमें अंदरूनी दुश्मनो से है।  

 

पर अबकी बार भी चुनाव होंगे और फिर  आएंगे आप  गिड़गिड़ाते हुए हमारे सामने झोली फैलाये। .

तब पूछूंगा मैं , एक चुनाव के प्यादे से ज़्यादा क्या पहचान है मेरी आपके लिए ??

 

 

“ख़ैर किसी भी तरह की ऊँची सोच राजनेताओं से अनअपेक्षित ही है , परन्तु इन् सभी सवालों के लिए राजनेता उत्तरदाई तो अवश्य ही हैं !”

 

 

मैं इश्क़ लिख रही हूँ !

 

मैं इश्क़ लिख रही हूँ , मैं तुम्हे लिख रही हूँ !

बनारस !!

 

तुम्हारी वो लचकती गलियाँ ,

तुम्हारा वो अल्हड़पन !

तुम्हारी वो सशक्त सीढियाँ ,

तुम्हारी वो रूहानी शाम का ढलना। 

 

मैं  वो सब लिख रही हूँ, मैं… इश्क़ लिख रही हूँ। ………!

 

की तुम्हारे  वो निश्छल घाट ,

तुम्हारे वो लज़ीज़ पकवान !

तुम्हारी वो रंगीली होली की शाम,

और तुम्हारा वो दिवाली का श्रृंगार !

 

मैं  सब लिख रही हूँ, मैं तुम्हे लिख रही हूँ !

 

तुम्हारी वो गंगा-जमुनी तहज़ीब।  

तुम्हारी  वो सुबह -ए बनारस की  महफिलें।   

तुम्हारा वो साड़ियों में बनारसी विरासत को बुनना।

तुम्हारा वो जीवन-मरण को इस समान देखना।

  

तुम्हारा  वो अपनापन, मैं  सब लिख रही हूँ, 

मैं इश्क़  लिख रही हूँ, मैं तुम्हे  लिख रही हूँ !!

 

 

 

 

 

ये हसीं !!

ये हसीं !

जो सम्बल देती है।

ये हसीं !

जो बार बार याद दिलाती है नहीं भुलाया आपने मुझे ,

की वही आपके शब्द दोहराती है ,

” बेटा आँखें पोछो , तुम सब संभाल  लोगी ”

 

ये हसीं !

एक बार फिर जीवन देती है।

Dear Diary…!

Dear Diary..!

I know you missed me a lot!

I am really sorry, I left you alone in one corner of the shelf and 

got engaged with my new friend, that is online writing.

But somewhere in the corner of my heart, I also missed you.




Now when you are in my hands, there is a constant smile on my face, 

which I am unable to stop... :)




Today when I turned your old pages and read all my previous articles,

I literally lived those moments again.

That journey of all Ups and Downs and so many funny moments,

with a mix of different sorts of emotions.




I know you are getting old with time,

Your pages are turning yellow and torn,

But you are in my heart.

whosoever comes in this world has to go one day,

And You will go with me!!


कुछ सीख पाएंगे हम या फिर वही पुराने रंग दिखाएंगे हम !

सोचती हूँ क्या लिखुँ , इस COVID पर ,

इतना कुछ पहले ही लिखा जा चुका  है इसपे।

 

घरों में रहिये , दुरी बनाये रखिये।

साफ़ सफाई रखिये, और सुरक्षित रहिये।

 

पर इस COVID ने जो हमें सीखा दिया ,

क्या वो हम कभी बिना इस एक सूक्ष्म वायरस के समझ पाते ?

कदापि नहीं।

 

हमने तो मानव जाती को ही सर्व श्रेष्ठ मान लिया था।

हम जैसे चाहे , इस पृथ्वी , गगन और अंतरिक्ष को मोड़ सकते हैं , मान लिया था।

 

पर वास्तविकता तो कुछ और ही निकली,

जब सिर्फ एक वायरस ने हमारी परिस्तिथि बदल दी।

जिससे हर टेक्नोलॉजी होने के बाद भी हम अब तक जूझ रहे हैं।

 

सिर्फ एक वायरस ने हमें  घर की चार दीवारी में कैद कर दिया है।

अब शायद मनुष्यों के लिए ये समझ पाना आसान होगा की ,

पशुओं को पिंजरे में कैद होकर कैसे लगता है !!

 

परन्तु विस्मय नहीं कोई इसमें ,

की ढाक के तीन पात हो जायेंगे हम।

और फिर वही पुराने रंग दिखाएंगे हम !!

 

 

 

 

नाम हूँ मैं !!

क्या हुआ जो तुमने कहा, नहीं बन  सकती  मैं आत्म -निर्भर ,
पर खुद को भीड़ से अलग , स्वावलम्बी बना लेने का नाम हूँ मैं !
 सदियों तक रौंदा तुमने , मेरे आत्मा-सम्मान को ,
पर इस समाज की भट्टी में जल कर,
कुंदन बन आने का नाम हूँ मैं !
 कहा किसी ने मुझे , की नहीं हैं ,
कुछ पा लेने की हस्त -रेखाएं मेरी  हथेलियों  में !
उन  रेखाओं को हथेलियों से छील कर ,
आगे बढ़ आने का नाम हूँ मैं !
क्या हुआ जो तुमने कहा , वो आग नहीं मुझमे ,
पर सूरज की लौ लिए , सब कुछ जला देने और ,
सब कुछ बना देने , का  नाम हूँ मैं !
कुछ वक़्त तुम्हारा था , और  कुछ मेरा ना था ,
 पर वक़्त पे अपना नाम लिख आने का,
नाम हूँ मैं !!

उड़ने की चाह !!

उड़ने की चाह है ,
इस सिंदूरी शाम को, अपने अंको में भर लेने की चाह  है !
उड़ने की चाह है !
इस अविरल आसमान में , पक्षियों संग अनवरत  उड़ने की चाह  है.
इस शून्य अंतरिक्ष को , अपने पंखों से नाप लेने की चाह  है। 
उड़ने की चाह है ,
बांध  सके ना कोई मुझे भरण – पोषण के बंधनो में ,
कुछ ऐसे उड़ने की चाह है !
ये घना  अँधेरा , रात्रि के पहर का  भी,
रोक ना  पाए मुझे , इस संध्या सखी को अपने अंको  में बांधने  से  
कुछ ऐसे उड़ने की चाह है !
 कभी ना  रुकू, ना  कभी थकूं ,
इस साँझ को निहारते ,
कुछ ऐसे उड़ने की चाह है !